सबसे तेज खबर/पांवटा साहिब

शिलाई क्षेत्र के पश्मी गांव स्थित चालदा महासू महाराज के पावन प्रांगण में इस वर्ष का बिशु उत्सव बड़े ही हर्षोल्लास, आस्था और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। पूरे क्षेत्र में उत्सव को लेकर कई दिनों से तैयारियां चल रही थीं और जैसे ही मेले का शुभारंभ हुआ, पश्मी गांव श्रद्धालुओं से खचाखच भर गया। इस बिशु मेले का सबसे प्रमुख आकर्षण चालदा महासू महाराज के निमंत्रण पर उनके बड़े भाई बोठा महासू महाराज की पालकी का द्राविल से पश्मी आगमन रहा। पालकी यात्रा के दौरान मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने फूलों की वर्षा कर स्वागत किया। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर श्रद्धालु झूमते नजर आए, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब गया।

पश्मी गांव पहुंचने पर चालदा महासू महाराज के डोरिया (देव प्रतिनिधि) स्वयं मंदिर द्वार पर पहुंचे और पूरे विधि-विधान के साथ बोठा महासू महाराज की अगवानी की। इसके बाद बोठा महासू महाराज की पालकी को शोभायात्रा के रूप में मंदिर परिसर तक लाया गया, जहां विधिपूर्वक गर्भगृह में प्रवेश कराया गया। गर्भगृह में चालदा महासू महाराज और बोठा महासू महाराज की पालकियों का मिलन हुआ, जो श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भावुक और श्रद्धा से भर देने वाला क्षण रहा। रात्रि के समय मंदिर प्रांगण में भव्य जागरण का आयोजन किया गया। इसमें स्थानीय कलाकारों और भजन मंडलियों ने पहाड़ी संस्कृति और परंपराओं को जीवंत करते हुए एक से बढ़कर एक भक्ति गीत प्रस्तुत किए। पारंपरिक नृत्य और लोकगायन ने श्रद्धालुओं को पूरी रात बांधे रखा। श्रद्धालु भक्ति में लीन होकर रातभर जागरण में शामिल रहे।

मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक प्रबंध किए गए थे। मंदिर परिसर में ही लंगर (भंडारा) की व्यवस्था की गई, जहां हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवकों की टीम मुस्तैद रही। 60 के आस पास पुलिस के जवान विशेष तौर पर शिलाई से पशमी तक जगह जगह तैनात किए गए हैं जो ट्रैफिक व्यवस्था और सुरक्षा की जिम्मा संभाल रहे हैं। एसडीएम शिलाई जसपाल भी इस दौरान शिलाई से पशमी मंदिर तक की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए लगातार प्रयासरत रहे! मंदिर समिति के सदस्य नितिन चौहान ने जानकारी देते हुए बताया कि इस भव्य आयोजन के दौरान लगभग 30 हजार श्रद्धालुओं ने मंदिर में पहुंचकर दर्शन किए और भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया। उन्होंने कहा कि बिशु उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।


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